गई परीक्षा गरमी आई, मिलकर कुछ करते हैं भाई !

Submitted by admin on Thu, 07/20/2017 - 14:38
Summer Camp - Taekondu Class
ताइक्वांडो का प्रशिक्षण

शायद गर्मी की छुटिट्यां शुरू होते ही सूरज की गर्मी को बच्चे यहीं कहना चाहते हैं। क्योंकि इन छुटिट्यो में कुछ सीखने कुछ करने और कर गुजरने की लगन को सूर्य की तपिश भी कुछ ना कर पाई।

गर्मियों की छुटियां शुरू होते ही कुछ बच्चे जहां गाँव जा कर अपने परिवार के बीच वक्त गुजारना पसन्द करते हैं वहीं कुछ ख़ास जगह जाकर पिकनिक मनाना चाहते है। लेकिन कुछ बच्चे ना तो कहीं जा पाते है ना ही छुटिट्यों का सदुपयोग कर पाते है। इन्ही चीजो को ध्यान में रखते हुए जे.एम.सी. के प्रांगण में समर कैम्प का आयोजन किया गया। जिसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार के शिक्षाप्रद और मनोरंजक कार्यक्रम चलाए गए।

सत्र की शुरूआत 1 जून 2017 को हुई। पहले सत्र में एक तरफ जहां बच्चों ने कोरे कागज पर जीवन का रंग भरा वहीं दूसरी तरफ बेकार पड़े कागज और विभिन्न  प्रकार की बेकार वस्तुओं को जीवन्त रूप दिया। ऐसी कोई चीज ना बची जिन्हे नया जीवन देने से कोई चुका। पेंसिल, ब्रष, पेन यहाँ तक की उगलियों से भी इन्होने अनेक चित्रकला और कलाकृति का अदभूत नमूना पेष किया। उन्होने सी.डी, स्टोन, वेस्ट पेपर पत्ते, चावल, जैस अनेक वस्तुओ का प्रयोग कर फोटो फ्रेम, पेन पॉट और भी अनेक सजावटी चीज़े बनाई। इन्हे देखकर लोग आहा करने पर मजबूर हो गए ।

3 जून, जे.एम.सी. के प्रांगण में 1857 जैसा नज़ारा देखन को मिला। एक तरफ बच्चों का एक ग्रुप सरकार की भूमिका निभा रही थी तो दूसरी तरफ एक आम जनता का ग्रुप, जो अपने अधिकारों और स्वतंत्रता को लेकर आंदोलन पर उतर आए थे । सरकार अपने स्वार्थ के लिए आम जनता को अधिकारो से वंचित रखना चाहती है, पर जनता अपने हर अधिकार को पाना चाहती है। इस प्रकार बच्चों ने बहुत सारे अधिकारों के बारे में चर्चा की जो उनको या उनके परिवार को नहीं मिल रहे है, जैसे स्कूल में शिक्षा का अधिकार, घर में पोषण और जल की कमी, क्षेत्र में सवतंत्रता और सड़को की खस्ता हालत, स्वास्थ्य का अधिकार और उचित चिकित्सा का आभाव आदि। जिस तरह से नाटक के माघ्यम से बच्चों ने अधिकारों और सुविधाओं की मांग की उससे उसमें क्रांतिकारियों की एक झलक दिखाई दे रही थी। अधिकारों के बारें में बेहतर समझ के लिए संविधान और मानवधिकारों के विषयों पर चर्चा की गयी।

इन सब के बाद जरूरत थी बच्चो में वो ज्ञान विकसित करें जिसके द्वारा वो गैर-हिंदी भाषी लोगो के साथ अंग्रेजी में बात कर सके। इस सत्र में बच्चो को स्कूल, कॉलेज, क्लीनिक, रेल्वे स्टेशन, बस में दोस्तों या परिवार के लोगों के साथ अंग्रेजी में से किस प्रकार बातचीत की जाए,  यह बताया गया। उन्हे उन स्थानों की कल्पना करने को कहा गया, जहां वे सिर्फ अंग्रेजी में ही बात कर सकते है। इसमें बच्चों के कुछ खुद ही एक दुसरे से सिखा, तो कुछ बाहर से आये अंग्रेजी का ज्ञान रखने वाले प्रशिक्षकों ने बताया. यह सत्र 6 जून को आयोजित किया गया।

7 और 8 जून को बच्चो को अपने सपनो और कल्पनाओं को कागज पर उतारने का मौका मिला। बच्चों ने दिए हुए विषय पर अपने कल्पनों के आधार पर अच्छी और प्रेरणादायक कहानियां लिखी। यह एक समूह कार्य था। पहले सभी बचों को 4 समूहों में बांटा गया और हर एक गुट को कुछ शब्द दिए गए, जिसके आधार पर उन्हें कहानी रचनी थी. सभी बच्चों ने सामूहिक तरीके से अपने समूह में एक नयी कहानी बनायीं। इस तरह से सभी बच्चों की कल्पना को मिलाकर उन्होंने एक अद्भुत कहानी की रचना की

इन सभी सत्रों के दौरान श्याम के समय में जे.एम्.सी के प्रांगण में “चिक्षॉ”, “चरेट”, “अने आषयो” आदी शब्दों से गूँज उठता था। इसकी वजह थी - बच्चो में आत्मरक्षा का कौशल सीखने की ललक और जूनून। हर दिन श्याम को बच्चो का आत्मरक्षा अर्थात् ताइक्वांडो का प्रशिक्षण दिया जाता था।  बाहर से आये प्रशिक्षक ने बच्चो को अपने हमला करने वालों से खुद की रक्षा करने का तरीके सीखाती थी। इसमें बच्चो को अनेक प्रकार का व्यायाम भी करवाया जाता है ताकि वो शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बन सके।

इन सभी सत्रों से एक बात उभर कर सामने आई कि बच्चो पर ना तो गर्मी का कुछ असर था ना ही उनमें जूनून की कोई कमी है। सभी प्रशिक्षकों का यह मानना था कि वे आए तो थे कुछ सिखाने के लिए, लेकिन साथ ही कुछ सीख कर भी जा रहे हैं।